« »

सताती सर्दी थी झोंपड़ी में मिली महल में मगर रजाई।

2 votes, average: 3.00 out of 52 votes, average: 3.00 out of 52 votes, average: 3.00 out of 52 votes, average: 3.00 out of 52 votes, average: 3.00 out of 5
Loading...
Hindi Poetry

हरेक पहलू से इसको देखा पहेली ये कुछ समझ न आई।
सताती सर्दी थी झोंपड़ी में मिली महल में मगर रजाई।

थी जब ज़रुरत ,खुली हकीकत, थे उनके वादे हवा हवाई,
मरीज़ के संग मिटा है कुनबा, है जां से महँगी मिली दवाई।

बहस का मुद्दों पे वक़्त किसको,है होती मजलिस में हाथापाई,
बने विदूषक, हैं फिरते नायक,कला की ऐंठे हुए कलाई।

हैं फेर में सब खुले न कलई ,कहाँ से उनको मिले मलाई ,
हैं योजनाओं पे योजनायें,न रोशनी, बस है रोशनाई।

विकास की बज रही है तुरही,चले न नौ दिन में कोस ढाई,
क़लम पुरस्कृत है जो अहर्निश बड़े बड़ों की करे बड़ाई।

न उनके माज़ी में झाँक प्यारे समझ उन्ही को तू दाई माई,
भविष्य के हैं वही विधाता, है उनसे अच्छी नहीं लड़ाई

4 Comments

  1. Vishvnand says:

    Rachanaa arthpoorn magar rhyme aur rythm aapkii any rachanaaon ke star kaa nahiin ….

  2. parminder says:

    sahee farmaayaa

    न उनके माज़ी में झाँक प्यारे समझ उन्ही को तू दाई माई,
    भविष्य के हैं वही विधाता, है उनसे अच्छी नहीं लड़ाई

Leave a Reply