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सुकून आ गया है थोडा……..! (गीत)

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Hindi Poetry, Podcast

मेरा यह  इक   पुराना  रचा दार्शनिक गीत इसके नए audio में गाकर प्रस्तुत करने में खुशी महसूस कर रहा हूँ ….

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सुकून आ गया है  थोडा……..!

अब सुकून आ गया है जिन्दगी मे थोडा,
जब से मैंने औरों संग दौड़ना है छोडा…
जब से मैंने औरों जैसा दौड़ना है छोडा…

अब तो वक्त मिल रहा है, कुछ तो ख़ुद के वास्ते,
सोचने का हूँ मैं कौन, कौन से हैं रास्ते.
लग रहा है सब नया, जो दृष्टि कुछ नयी मिली,
पहले जैसी दुनिया भी है, लगती अब नई नई ……

भा रहा निसर्ग जैसे स्वर्ग ही यथार्थ ये,
मुक्त मन जो हो गया है, व्यर्थ के स्वगर्व से,
मुक्त मन जो हो गया है, अर्थहीन स्वार्थ से…..

वक्त जो गुजर गया है, उसकी न परवाह है,
हाथ मे समय बचा है, पल पल उससे प्यार है.
हूँ अलिप्त मैं मगर, सर्व में जुटा हुआ,
दलदलों में देख कमल, सुंदर सा जी रहा……..

अब जो राहें चल रहा हूँ, कुछ तो ख़ुद चुनी हुईं,
हर छलांग पे यहाँ हैं, मंजिलें नयीं नयीं .
बाजी ख़ुद से है यहाँ, इंसान पूर्ण बनने की,
दिन-ब-दिन नया नया प्रयोग, ख़ुद ही करने की.

है कठिन ये राह फिर भी चलने में सुकून है,
ना किसीसे दोस्ती न दुश्मनी की शर्त है.
पास कुछ नहीं जो मेरे, खोने का मैं भय धरूँ,
ज्ञान ये हुआ कि ज्ञान ही बटोरता फिरूं……

ये है ऐसी राहें, जिनको भी मेरी तलाश है,
मंजिलें ये ऐसी, जिनको मेरा इंतजार है,
मंजिलें ये ऐसी जो मेरे ही आसपास हैं……

अब सुकून आ गया है जिन्दगी मे थोडा,
जब से मैंने औरों संग दौड़ना है छोडा…
जब से मैंने औरों जैसा दौड़ना भी छोडा……

“ विश्व नन्द “

4 Comments

  1. s n singh says:

    A masterpiece.
    In my opinion
    अब तो वक्त मिल रहा है, कुछ तो ख़ुद के वास्ते,
    सोचने मैं कौन हूँ, और कौन से हैं रास्ते.
    pratham pankti me “तो” ki punaravritti uchit nahin hai, we could have said it like-
    वक्त मिल रहा है अब, कुछ तो ख़ुद के वास्ते,
    isi tarah doosri pankti me vyakaran sammat prayog hota –

    सोचने का हूँ मैं कौन, कौन से हैं रास्ते.
    sochne ke baad “ka” ka abhaav khalta hai!Hope you don’t take it otherwise Sir.

    • Vishvnand says:

      इस comment के लिए आपका हार्दिक आभार और बहुत बहुत धन्यवाद
      ऐसे ही interactions तो यहाँ sharing के असली माने होते हैं और author को अपनी posting पर सीखने और विचार करने के लिए भी बहुत कुछ मिलता है .

      मेरा हिंदी का acedemic अभ्यास और ज्ञान अत्यंत कम है प्रायमरी 4th क्लास तक ही था उसके बाद की सब पढाई English में थी .पर रचनाएँ और गीत मुझे हिंदी में ही सूझते हैं और इस साईट पर ही मैंने आप सब की रचनाएँ पढ़ पढ़कर ही कुछ सीखा है. . हिंदी में मुझे अपनेआप कवितायें /गीत सूझते हैं और English रचनाएँ हरदम इक conscious प्रयास सी ही रहती हैं। ….

      इसीलिये आपके सुझाव का हार्दिक आदर करते हुए मेरा यह response
      है …यह गीत मुझे मेरे retire होने के समय के एक वर्ष पहले रच गया था और जिस तर्ज़ में उभरा था और जिस तरह वैसे ही बिना कोई ज्यादा correction के गाया और पोस्ट किया हुआ है .

      अब आपने सुझाए हुए correction जो सब उचित और सही हैं उनका आदर करते हुए मुझे मेरी ये बात कहना है

      “अब तो वक्त मिल रहा है, कुछ तो ख़ुद के वास्ते” इस पंक्ति में कुछ दोनों के लिए applicable है ” कुछ तो वख्त” और “कुछ तो खुद के वास्ते” और यही भाव इस पंक्ति को दर्शाना रहा होगा ….

      “सोचने मैं कौन हूँ, और कौन से हैं रास्ते” यहाँ असल में meaning है …. सोचने “मैं कौन हूँ, और कौन से हैं रास्ते”…. याने To think ” Who I am & and what may better be my ways” तो फिर “का ” की जरूरत शायद यहाँ नहीं हो जो गीत की लय में बाधा डाले .मैंने यह सुधार अब रचना में कर दिया है …

      इस मेरे explanation के बारे में आपके विचार जरूर जानना चाहूँगा …

      Thank you so very much for respecting the post and sharing your considered comment on it…

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