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बाहर दीखे जो वह झूठ रहा अन्दर सब आता

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Hindi Poetry

 

बाहर दीखे जो वह झूठ रहा अन्दर सब आता

तार बंधे जिसके जिससे सच दिल वह जाना जाता

सूत्र नियति के कहाँ और क्यों छिपे न बूझा जाए  

गाँठ एक जो बंधी मगर हरदम रहती कसकाए

 

प्रश्न बना जीवन बस तरसा तड़पाया रह जाता

डोर हाथ ले कठपुतली सा जाने कौन नचाता

परकाया प्रविष्ट प्रेत से बाधित दिल रह आए

घिरे प्यार घनघोर भिड़े टकरा न बरस पर पाए

 

भटक भटकते बढ़ें कदम साँसें थक थम चुक आतीं

लक्ष्य अलख इच्छाएं प्यासी मृगततृष्णा रह आतीं

दिल दो एक पहेली बंद रही अनबूझी आये

किये जतन मिल जाने कितने हारे पर चुक आये

 

चुभी कील इक हरे प्राण रह हाय जुदा क्यों आए

रूठ मनाते इक दूजे मिल दिल अब कौन मनाए 

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2 Comments

  1. Vishvnand says:

    सुन्दर रचना /गीत है , बधाई
    “रूठ मनाते इक दूजे मिल दिल अब कौन मनाए”
    अनन्य ये अंदाज़ गीत का बढ़िया मन को भाए …!

  2. s.n.singh says:

    bhasha zara vyakaran ki paridhi se baahar nikal gayi so samajh n paya bilkul kya hai kahne ka abhipraay.

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