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अजब कोठरी काल की अपनी आप मिसाल

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Hindi Poetry

अजब कोठरी काल की अपनी आप मिसाल

इससे अपने आप को पाया कौन निकाल.

 

एक एक कर ये करे डायल सबके अंक,

नंबर सबका ही लगे हो न कोई मिस काल.

 

दौलतमंदी छांटते दिल के असल गरीब,

भीख कलन्दर मांगता मन से मालामाल.

 

रही चलन में अब कहाँ वफ़ा ,बाहमी चाह,

फ़क़त इश्तिहारों अंटी हर दिल की दीवाल .

 

बलिहारी जम्हूरियत प्यादे बने वजीर,

उड़न खटोले चढ़ चलें टेढ़ी टेढ़ी चाल.

 

 

2 Comments

  1. Vishvnand says:

    Vaah vaah atisundar rachana, har chand ik misaal
    Padhkar ye rachana huaa man “Mood” khush-haal…

    Hearty commends ….!

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