« »

ऋण ही ऋण हूँ मैं धन कीजिये

2 votes, average: 4.50 out of 52 votes, average: 4.50 out of 52 votes, average: 4.50 out of 52 votes, average: 4.50 out of 52 votes, average: 4.50 out of 5
Loading ... Loading ...
Hindi Poetry
रूप रस आचमन कीजिये 

प्यास उर की शमन  कीजिये 
खेल खुल के यहाँ खेलिए 
रमणियों में रमण  कीजिये 
नीति सम्मत बचे कुछ नहीं 
नीति नय का क्षरण  कीजिये 
बेइमानी ही ईमान हो,
इक नया व्याकरण  कीजिये 
बनिए भर्ता भले देश के,
सिर्फ अपना भरण  कीजिये 
सब हया शर्म पी जाइये,
हथकड़ी आभरण  कीजिये 
मोटे ताज़े बनें और भी 
जब भी व्रत आमरण  कीजिये
 
दीन दुखियों को दुत्कारिये 
मुजरिमों को शरण  कीजिये  
तोड़ तटबंध नदिया चढ़ी,
शौक़ से संतरण  कीजिये 
चूमने को हैं चेले खड़े 
दैव,आगे चरण  कीजिये .
बेखटक लूटिये मुल्क़ को,
लोभ मत संवरण  कीजिये .
कुछ क़रम कीजे नाचीज़ पे,
ऋण ही ऋण हूँ मैं धन  कीजिये .
मुल्क़ अपने में रक्खा ही क्या 
मुल्कों मुल्कों भ्रमण  कीजिये .
है ये मुफलिस निहत्था निरा,
आइये आक्रमण  कीजिये .
पेट भाषण से भरता नहीं,
कैसे भूखे भजन  कीजिये.
 
सोचिये कुछ तो माहौल की,
मत सदा विष वमन  कीजिये.
 चाहते लहलहाये फसल 
बीज पहले वपन  कीजिये .
मत दिखा के सुनहले हिरन,
सत्ता सीता हरण  कीजिये .

2 Comments

  1. Vishvnand says:

    Vaah, bahut badhiyaa, bahut khuub

    Aur
    Loot saath sab narak lejaane
    Bhagvan se darkhaast kiijiye

Leave a Reply