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“विरह-गीत”

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Hindi Poetry, Uncategorized

(सावन के इस महीने में प्रस्तुत है…
एक विरह-गीत…)

रिम-झिम रिम-झिम सावन बरसे…
तरसे जियरा सजन को…

साँझ भी जाए ढलती-ढलती…
पर ना आए वो मिलन को…

प्यास जिया की बढ़ती जाए…
कह दे जाके कोई उनको…

प्रेम की आई ऋतु ये सुहानी…
ना तड़पा तू यूँ हम को…

कर दे पूर्ण कोई मेरी कहानी…
आ जाए बरसन को…

व्याकुल देखो है ये मन अब…
अब श्वास नहीं तरसन को…

रिम-झिम रिम-झिम सावन बरसे…

2 Comments

  1. Vishvnand says:

    Sundar Manbhaavan geet …
    Badhaai

    रिम-झिम रिम-झिम सावन बरसे…
    tarasaa kar rijhaaye man ko ….. 🙂

    • P4PoetryP4Praveen says:

      रिम-झिम रिम-झिम सावन बरसे…

      तरसाकर रिझाए मान को…

      आओ हम सब मिल महकाएं P4P के आँगन को… 🙂

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