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“जीना”

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Hindi Poetry, Uncategorized

दर-ब-दर की ठोकरें खाकर भी मैं ज़िंदा रहा…

नासमझ ज़माने ने जो देखा बस वो ही कहा…

मगर भीतर से मन और तन बाहर से…

बहुत मज़बूत सा होता गया…

कामयाबी ही नहीं पैमाना जीत जाने का…

गिरकर सँभलना और ना गिरना…

नाम है जी जाने का…

4 Comments

  1. Vishvnand says:

    vaah . bahut khuub
    yahii to hai vo pyaaraa rastaa
    jaan se jee jaane kaa

    • P4PoetryP4Praveen says:

      बस आप बड़ों के नक़्शे-क़दमों पर चलना सीख रहे हैं दादा… 🙂

  2. Suresh Dangi says:

    Very inspiring !!!

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