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***नई फरेबी रात …***

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Anthology 2013 Entries

नई फरेबी रात …

छोडिये साहिब !

ये तो बेवक्त …..
बेवजह ही …..
ज़मीं खराब करते हैं //
आप अपनी अंगुली ….
के पोर इनसे …..
क्यूं खराब करते हैं//
ज़माने के दर्द हैं ….
ज़माने की सौगातें हैं //
क्योँ अपनी रातें ….
हमारी तन्हाई पे …..
खराब करते हैं  //
ज़माने की निगाह में ……
ये नमकीन पानी के अतिरिक्त ….
कुछ भी नहीं //
रात की कहानी …
ये भोर में गुनगुनायेंगे //
आंसू हैं,निर्बल हैं ..
कुछ दूर तक …..
आरिजों पे फिसलकर …..
खुद-ब-खुद ही सूख जायेंगे //
हमारे दर्द हैं …..
हमें ही उठा लेने दीजिये //
आप आये हैं …
तो महफ़िल में ….
तबले की थाप पे …..
घुंघरू की आवाज़ का ……
मज़ा लीजिये //.
साजिंदों के साज पे ……
तड़पते नग्मों का ……
साथ दीजिये //
शुक्र है इन घुंघरुओं का …..
जो अपनी झंकार में …..
पाँव के दर्द को ….
पी जाते हैं //.
इनकी आवाज के भरोसे ……
हम कुछ लम्हे …..
और जी जाते हैं //
अपने कद्रदानों की ….
हर वाह पे हम ……
जाँ निसार करते हैं //
जानते हैं फरेब है …..
ये शब् भर की महफ़िल //
फिर भी …
ये कम्बख्त घुंघरू ….
इक …
नई फरेबी रात का ….
इंतज़ार करते हैं //
,इंतज़ार करते हैं //
सुशील सरना

2 Comments

  1. SN says:

    a different one

  2. sushil sarna says:

    Thanks for ur so encouraging comment Singh saahib

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