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***गर्द की आंधियां …***

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Hindi Poetry

गर्द की आंधियां …

रुखसत हुए जहां से. तो ..ज़िन्दगी ..हंसने लगी 

…..हमसे पहले ख्वाहिशों की …..लाशें दूर जलने लगी 

………ख़ाक में मिलने से पहले दीदार की हसरत क्या की 

…………..हमको मिटाने गर्द की …आंधियां फिर चलने लगी 

सुशील सरना /30.05.2013

4 Comments

  1. P4PoetryP4Praveen says:

    गर्द की आँधियाँ जो चलने लगीं…

    हमारी उंगलियाँ भी…अब…

    क़लम संग…चलने को मचलने लगीं… 🙂

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