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कहीं पलकों पर नींद का मज़ार देखते हैं ……

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आँखों से उठता यादों का ग़ुबार देखते हैं
कहीं पलकों पर नींद का मज़ार देखते हैं
एक हम ही नहीं बेताब बिछड़ उनसे यहाँ
कहीं खुशबु कहीं गुलों को बेक़रार देखते हैं
मैं गश खाकर अपनी वफाओं से गिर गया
उनसे कहो कभी वो अपना किरदार देखते हैं
साया जब बढे यादों का आँगन में शाम ढले
सिकुड़ती सीने में दिल की दिवार देखते हैं
दिल के लहू से लिखते हैं दास्ताँ हम अपनी
जलती है नज़र उनकी जो अशआर देखते हैं

गुज़री होगी क्या कल ग़रीब के दिल पर साहब
उजड़ी बस्तियां और आप फ़क़त अखबार देखते हैं

One Comment

  1. sushil sarna says:

    no words, after a long time u have submitted ur shaayree-fir wahee mazaa aa gya fir vahee yaad ka jaljalaa aa gya, Shakeel bhaaee bahut bahut mubark

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