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रिश्तों में इस अहद के मुहब्बत कहाँ नसीब .

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यादों के रेगज़ार में राहत कहाँ नसीब

जज्बों में बीते वक़्त सी शिद्दत कहाँ नसीब .

 

जो शख्स छोड़ छाड़ के घर को, चला गया,

उसको कोई शिनाख्त,शहादत कहाँ नसीब  .

 

उन्सो वफ़ा का जिक्र तरानों में ही बचा,

रिश्तों में इस अहद के मुहब्बत कहाँ नसीब  .

 

आ ही गए हैं आप तो इक शब गुज़ारिये,

यूँ रोज़ रोज़ आप की सोहबत कहाँ नसीब  .

 

जीने की जद्दो जहद में जीना हुआ मुहाल,

इक सांस भी लें चैन की,फुरसत  कहाँ नसीब  .

 

ओहदा तुम्हे  दिला तो गयी खिदमते  अवाम,

सबको मगर यूँ काम की उज़रत कहाँ नसीब  .

 

कागज़ के फूल बज़्म की जीनत तो हो गए,

इनको गुले बहार की निक़हत कहाँ नसीब  .

 

ख़ादिम हूँ खासो आम का कहना तो है सहल,

होते मगर अवाम को हज़रत कहाँ नसीब।

 

4 Comments

  1. Raj says:

    Another good one. Thanks for sharing.

  2. Vishvnand says:

    vah vaah bahut khuub aur badhiyaa
    padhane mile aisee gazal bhii chaahiye naseeb ….

    hardik abhivaadan

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