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रिश्तों में इस अहद के मुहब्बत कहाँ नसीब .
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यादों के रेगज़ार में राहत कहाँ नसीब
जज्बों में बीते वक़्त सी शिद्दत कहाँ नसीब .
जो शख्स छोड़ छाड़ के घर को, चला गया,
उसको कोई शिनाख्त,शहादत कहाँ नसीब .
उन्सो वफ़ा का जिक्र तरानों में ही बचा,
रिश्तों में इस अहद के मुहब्बत कहाँ नसीब .
आ ही गए हैं आप तो इक शब गुज़ारिये,
यूँ रोज़ रोज़ आप की सोहबत कहाँ नसीब .
जीने की जद्दो जहद में जीना हुआ मुहाल,
इक सांस भी लें चैन की,फुरसत कहाँ नसीब .
ओहदा तुम्हे दिला तो गयी खिदमते अवाम,
सबको मगर यूँ काम की उज़रत कहाँ नसीब .
कागज़ के फूल बज़्म की जीनत तो हो गए,
इनको गुले बहार की निक़हत कहाँ नसीब .
ख़ादिम हूँ खासो आम का कहना तो है सहल,
होते मगर अवाम को हज़रत कहाँ नसीब।

Another good one. Thanks for sharing.
thanks for the compliment Sir.
vah vaah bahut khuub aur badhiyaa
padhane mile aisee gazal bhii chaahiye naseeb ….
hardik abhivaadan
dhanyavad mahoday.