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बेहतर था मुझे गर तेरी जगह हो जाती मुहब्बत पत्थर से

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Hindi Poetry

टकराता लेता सर पत्थर से हो जाती इनायत पत्थर से,

बेहतर था मुझे गर तेरी जगह हो जाती मुहब्बत पत्थर से।

 

हुस्न के एक मुजस्सम से उम्मीदे वफ़ा नाकाम हुई,

क्या करता मिलती थी मेरे महबूब की फ़ितरत पत्थर से।

 

गैरों की तरह तु भी आगे आके मुझको संगसार ही कर,

दे तंज कलेजा चाक न कर मुझे दे दे रियायत पत्थर से।

 

इन चलते फिरते लोगों से बाँटूं जाके क्या दर्द कोई,

जो खुद अपने दर्दे-ग़म की करते हैं शिकायत पत्थर से।

 

शुरू हुई थी पत्थर से आखिर भी पत्थर पर होगी,

कायनात शुरू से करती शुरू चंदनये कुदरत पत्थर से।

4 Comments

  1. kshipra786 says:

    good one sir.

  2. Vishvnand says:

    Vaah vaah
    sundar rachanaa aur badhiyaa andaaze bayaan
    bahut man bhaayaa

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