| « Unfortunate ….! | ***संग अंसुअन के बही जाए …..*** » |
बेहतर था मुझे गर तेरी जगह हो जाती मुहब्बत पत्थर से
| Hindi Poetry |
टकराता लेता सर पत्थर से हो जाती इनायत पत्थर से,
बेहतर था मुझे गर तेरी जगह हो जाती मुहब्बत पत्थर से।
हुस्न के एक मुजस्सम से उम्मीदे वफ़ा नाकाम हुई,
क्या करता मिलती थी मेरे महबूब की फ़ितरत पत्थर से।
गैरों की तरह तु भी आगे आके मुझको संगसार ही कर,
दे तंज कलेजा चाक न कर मुझे दे दे रियायत पत्थर से।
इन चलते फिरते लोगों से बाँटूं जाके क्या दर्द कोई,
जो खुद अपने दर्दे-ग़म की करते हैं शिकायत पत्थर से।
शुरू हुई थी पत्थर से आखिर भी पत्थर पर होगी,
कायनात शुरू से करती शुरू ‘चंदन’ ये कुदरत पत्थर से।


good one sir.
thankyou kshipra
Vaah vaah
sundar rachanaa aur badhiyaa andaaze bayaan
bahut man bhaayaa
thankyou sir