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गूंजने जैसी लगी कोई ग़ज़ल माहौल में।
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तल्खियाँ बढ़ने लगी हैं आज कल माहौल में।
कुछ करो है लाजमी रद्दो बदल माहौल में।
ओढ़ रक्खी है अंधेरों ने नक़ाबे रौशनी,
दोस्ती का भेस धर फिरते हैं छल माहौल में।
मुस्करा कर वो मुखातिब क्या हुआ हमसे ज़रा,
खिल उठे हैं सैकड़ों जैसे कँवल माहौल में।
तेरी परछाईं सी खिड़की में झलक सी क्या गयी,
गूंजने जैसी लगी कोई ग़ज़ल माहौल में।
दलदलों में फंस गया जैसे कि जम्हूरी निजाम,
दल ब दल बीमार ,फैला दलबदल माहौल में।

Vaah…
dhanyavad
vaah vaah bahut khuub
sach hai, kuch karate nahiin bas kahate hii rahe hain
bahut badlaav jaroori hai laayenge ham badal mahaul me …
inayat ka shukriya mahoday.
bahut khUb
thanks for the encouragement.
mast
it is so heartening to hear from you after a long interval,thanks.