| « सफ़र की सचाई तो कुछ और ही थी। | ***तमाम शब् उनकी नजरें …*** » |
इक झिझक बांधती क़दम मेरे उससे मिलने की आरज़ू भी है।
| Uncategorized |
खींच दे नक्श जैसे पानी पर
उस मुसव्विर में खूब खूबी है। musavvir-chitrakar
पुरसुकूं भी है वो समंदर सा,
और समंदर सा तुन्द खू भी है। tund khoo-tez aadat vala
मुख़्तसर भी ये हो रही मेरी
दास्ताँ हो रही शुरू भी है। mukhtsar hona-samapt hona
इक झिझक बांधती क़दम मेरे
उससे मिलने की आरज़ू भी है।
मार के मुझको क्या मिले तुझको
मैं फ़क़त मैं नहीं हूँ तू भी है।
मैकशों की सफों में बैठा भी
शख्स वो माईले वज़ू भी है। maayile vazoo-namaz ke pahle hath munh dhone me pravrit
हैं अमन का मसीहा कहलाता
और बला का वो जंगजू भी है।

vaah vaah kyaa baat hai
bahut badhiyaa in aapkii baaton me lagaa ye merii bhii hai…
dhanyavad mahoday.
मार के मुझको क्या मिले तुझको
मैं फ़क़त मैं नहीं हूँ तू भी है।…gajab sir gajab-main fakat main naheen too bhee hai….chhaa gaye sr chhaa gaye-badhaae Singh sahib
shukriya sir
मार के मुझको क्या मिले तुझको
मैं फ़क़त मैं नहीं हूँ तू भी है
वाह वाह बहुत खूब
dhanyavad bhai chandan ji.