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सखि वे मुझसे कह कर जाते,
| Hindi Poetry |
राष्ट्र कवि मैथिलि शरण गुप्त के काव्य यशोधरा के गीत
सखि वे मुझसे कह कर जाते,
तो क्या मुझको अपने मग की बाधा ही पाते।
के वज़न में यह हास्य व्यंग्य का प्रयास है,
सखि वे मुझसे कह कर जाते,
कितने काम पड़े हैं बाकी,
गए निकल वो कर चालाकी,
बेतरतीब पड़े जो बिखरे कपडे तो सब तह कर जाते।
भरनी फीस रही मुनिया की,
बबलू भी सीखे तैराकी,
ट्यूशन का भुगतान बक़ाया ये पेमेंट तो वह कर जाते।
दुश्मन बना मोहल्ला सारा
जिस तिस के घर में मुंह मारा
बैर जान का लगा गए क्यूँ जाते मगर सुलह कर जाते।
कल ही छूट अभी थे आये,
फिर दो दिन में ही बौराए,
अभी जेल की क्या ज़ल्दी थी,कुछ दिन घर तो रह कर जाते।

5tar , maja aa gaya,college ke dino ki yaad dila di aapne.
thanks a lot.
bilkul 5 star hai ! Absolutely fantastic! Gupt ji pareshaan ho rahe honge
thanks Parminder ji,Maithili sharan ji ke samay se ab samay bhi to badal gaya hai,dekhiye criminals kahan kahan pahunch gaye hain,qaanoon ke hath lambe hote hain suna tha magar crime ke hath usase bhi lambe ab dekh rahe hain.