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जादूगर की टोपी

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Hindi Poetry

रात जादूगर की टोपी एक
खरगोश दर खरगोश निकलते अचंभे
पहली दफे में निकला चाँद
फिर टपका शबनम का आम
तीसरी बार में निकली ख़ामोशी
मुई ने बोर कर दिया इतना बोली
फिर आई यादों की टोली
यादें मीठी हैं इसलिए अच्छी लगती हैं
मासूम कोई नन्ही बच्ची लगती हैं
पीछे से आई ठंडी हवायें
साथ में लाईं खोई दुआएं
छठा निकला बादल का टुकड़ा
ये भी अपने घर से है उखड़ा
सातवाँ आया एक पुराना आँसू
गाँव में किसी अल्हड़ बच्चे सा भटकता हुआ
मचलते हुए पैर पटकता हुआ.
अँधेरा गहराया
जादूगर ने फिर टोपी पर हाथ फिराया
नहीं थम रही थी अचंभों की लड़ी
आँख जब थक कर सपनीली होने लगी
तब
और तब निकला वो लम्हा एक
जिसमें तुम्हे आख़िरी बार देखा था
तुम हंसे थे, मैं रोया था
वो आँसू अब भी उधार पड़ा है
वो सब्ज़ लम्हा अब भी वहीं खड़ा है
जाता नहीं
धुँधलाता नहीं
मैं धुँधला जाऊं, तो शायद धुँधला जाए.

6 Comments

  1. Prem Kumar Shriwastav says:

    Waah…Bahut Hi Sundar Kavita…Badhai.

  2. Vishvnand says:

    vaah vaah rachanaa bahut badhiyaa laazavaab
    jaadugar kii topii ke kamaal hain khuubsoorat behisaab
    Kudos

  3. siddhanathsingh says:

    simply superb.subhaan allaah!

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