जादूगर की टोपी
रात जादूगर की टोपी एक
खरगोश दर खरगोश निकलते अचंभे
पहली दफे में निकला चाँद
फिर टपका शबनम का आम
तीसरी बार में निकली ख़ामोशी
मुई ने बोर कर दिया इतना बोली
फिर आई यादों की टोली
यादें मीठी हैं इसलिए अच्छी लगती हैं
मासूम कोई नन्ही बच्ची लगती हैं
पीछे से आई ठंडी हवायें
साथ में लाईं खोई दुआएं
छठा निकला बादल का टुकड़ा
ये भी अपने घर से है उखड़ा
सातवाँ आया एक पुराना आँसू
गाँव में किसी अल्हड़ बच्चे सा भटकता हुआ
मचलते हुए पैर पटकता हुआ.
अँधेरा गहराया
जादूगर ने फिर टोपी पर हाथ फिराया
नहीं थम रही थी अचंभों की लड़ी
आँख जब थक कर सपनीली होने लगी
तब
और तब निकला वो लम्हा एक
जिसमें तुम्हे आख़िरी बार देखा था
तुम हंसे थे, मैं रोया था
वो आँसू अब भी उधार पड़ा है
वो सब्ज़ लम्हा अब भी वहीं खड़ा है
जाता नहीं
धुँधलाता नहीं
मैं धुँधला जाऊं, तो शायद धुँधला जाए.
Waah…Bahut Hi Sundar Kavita…Badhai.
shukriya
vaah vaah rachanaa bahut badhiyaa laazavaab
jaadugar kii topii ke kamaal hain khuubsoorat behisaab
Kudos
behad dhanyawaad
simply superb.subhaan allaah!
shukriya..