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  बसंत ऋतु

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Hindi Poetry

  बसंत ऋतु

सूरज ने कम्बल सरकाया,  हवा हुई रूखी-रूखी,
सिकुड़े दुबके पंख-पखेरू हर्षित बोले चीं चीं चीं ,
भाल क्षितिज पर बसंत राज की,
 हुई है दस्तक,
पुलकित हैं खग, भरें उडान लम्बी, 
 नभ तक,     
धानी-पीली चूनर ओढ़े,
खेतों की दुल्हन डोले,
रूप गर्विता, अल्लढा, राग-रंग-रस
घोले,
मदमाती, मुस्काती, हौले-हौले 
करती स्वागत बसंत-ऋतु का 
मुख पर झीनी चादर ओढ़े 
………………
पर मैं कैसे करूँ बसंत का 
स्वागत  …मन मेरा बोले ….
कल की तरह नहीं हूँ खुश मैं,
कल जैसा उत्साह नही है,
कल जैसी रौनक, स्वच्छंदता,  
पैरों में थिरकन नहीं है,
पंख कैसे फैलाऊँ मैं .. सोचो,
उडने की इजाजत नहीं है …
घाघ लगाए बैठे हैं बहेलिए 
चहकने की हिम्मत नहीं है … 
‘दामिनी’ की कराह सुनकर,
लगता जैसे …….. 
बसंत मनाने  की चाह नहीं है …….

सुधा गोयल ‘नवीन’

2 Comments

  1. Vishvnand says:

    अतिसुन्दर अर्थपूर्ण रचना
    बहु प्रशंसनीय, हार्दिक बधाई

    ऐसी ये मार्मिक अभिव्यक्ति
    हिरदय को झकझोर रही
    ‘दामिनी’ की कराह की यादें
    मनाएं बसंत ये चाह गई ….

  2. vijesh bhute says:

    Bohot hee sundar rachna Maam.

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