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” नाज़ ”

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Hindi Poetry


वो जिसके नाज़ हमने हँसके उठाए हैं।
वो उँगली आज हमपे जलके उठाए हैं।।

कान भर दिये उसके किस ना-मुराद ने।
माँगा आइना तो उसने तलवे दिखाए हैं।।

घड़ी आई जब रुखसते-बदन की तरफ़।
तो गुलाबी हाथ उसने मलके उठाए हैं।।

जिसके रुख पे नक़ाब हया की शान थी।
वही खुले-आम अपने जलवे दिखाए हैं।।

डूबने को ‘साहिल’ उसकी नज़र काफ़ी।
फिर क्यूँ मुझे गिरते झरने दिखाए हैं।।

4 Comments

  1. SN says:

    chauthe sher me jo aur jiske ki punaravritti dosh hai, sudhaar kar kahen

    • sahil says:

      सर्वप्रथम सदर नमन,
      आपके आदेशानुसार शेर में संशोधन किया है कृपा करके उचित-अनुचित को बताने का कष्ट करें, सप्रेम धन्यवाद …
      जिसके रुख पे नक़ाब हया की शान थी।
      वही खुले-आम अपने जलवे दिखाए हैं।।

  2. jaspal kaur says:

    nice

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