| « मरने से क्यूँ डरना ….! | उन्हें रात में सोना जरा कम आता है » |
” नाज़ ”
| Hindi Poetry |
वो जिसके नाज़ हमने हँसके उठाए हैं।
वो उँगली आज हमपे जलके उठाए हैं।।
कान भर दिये उसके किस ना-मुराद ने।
माँगा आइना तो उसने तलवे दिखाए हैं।।
घड़ी आई जब रुखसते-बदन की तरफ़।
तो गुलाबी हाथ उसने मलके उठाए हैं।।
जिसके रुख पे नक़ाब हया की शान थी।
वही खुले-आम अपने जलवे दिखाए हैं।।
डूबने को ‘साहिल’ उसकी नज़र काफ़ी।
फिर क्यूँ मुझे गिरते झरने दिखाए हैं।।



chauthe sher me jo aur jiske ki punaravritti dosh hai, sudhaar kar kahen
सर्वप्रथम सदर नमन,
आपके आदेशानुसार शेर में संशोधन किया है कृपा करके उचित-अनुचित को बताने का कष्ट करें, सप्रेम धन्यवाद …
जिसके रुख पे नक़ाब हया की शान थी।
वही खुले-आम अपने जलवे दिखाए हैं।।
nice
सप्रेम धन्यवाद …