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सच्चे सेवक हैं वो,दाबें,चरण औ’गर्दन बारी बारी.

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नाच नाच के जोगन हारी.

ज़रा नहीं पिघले बनवारी.

 

बाजारों में बैठे बाबा,

मंदिर में बैठे व्यापारी.

 

बुझे आग कैसे, सुलगाएं,

पंडित मुल्ला बारी बारी.

 

हाथ न धो बैठो सर से तुम,

सच कहने की है बीमारी.

 

हरी हुए फैशन में हैरी

और गयीं हो मीरा मारी.

 

हम समझे मफरूर हुए वो,

गए फ़क़त वो बैठ फरारी.

 

जिस दिन कार गयी सर्विस में,

खली बहुत उनको बेकारी.

 

सच्चे सेवक हैं वो,दाबें,

चरण औ’गर्दन बारी बारी.

 

नगर निगम को क्यों गम व्यापे,

घेर सड़क बैठें व्यापारी.

4 Comments

  1. santosh bhauwala says:

    kararaa byang !bahut khoob

  2. Vishvnand says:

    बढ़िया और प्रभावी व्यंग

    बहुत कमाए बैठे ही बैठे
    मयखाने बाहर का भिखारी …. :)

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