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खुदपरस्तियों का मौसम चलेगा कब तक
| Hindi Poetry |
ओ आदमी तू आदमी ऐसे छलेगा कब तक,
ये खुदपरस्तियों का मौसम चलेगा कब तक|
बेचा करे जहर है आबे-हयात कहके,
बाजार न रहा तो सौदा फ़लेगा कब तक|
आँखें बतायें तेरे मन में चिंगारियां हैं,
बस कर न राख तन पे यूँ ही मलेगा कब तक|
चल रौशनी फ़ैलाता कोई चराग़ बनके,
नफ़रत की आग में तू आखिर जलेगा कब तक|
फ़ूटेगा जा के ‘चंन्दन’ जिस दिन घड़ा भरेगा,
ये हादसा बराबर आखिर टलेगा कब तक|


vaah vaah bahut khuub
mazaa aa gayaa padhataa rahaa ye bhali nazm jab tak
Hardik dhanyvAd sir
antim pankti lay aur vazan se alag ja padi, dekhiye kuchh sudhaar sambhav ho to,
footega ja ke chandan jis din ghada bharega
ye hadsa barabar aakhir talega kab tak.
धन्यवाद गुरुवर आपके बहुमूल्य सुझाव के लिए। पिछली दो रचनाएं जरूर देखें