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अपनी ख़ुशी न आये हम ….! (गीत)
| Hindi Poetry, Podcast |
Am pleased to share in its new audio, this ‘geet’ which had got composed inspired & emerged from pondering on a famous couplet of great Urdu Poet/ Shaayar Sheikh Muhammad Ibrahim “Zauq” …
“लायी हयात आये, क़ज़ा ले चली चले,
अपनी ख़ुशी न आये, न अपनी ख़ुशी चले …”
(हयात = जीवन, Life; क़ज़ा = मृत्यु , नसीब, death, destiny.)
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अपनी ख़ुशी न आये हम ….! (गीत)
ज़िन्दगी ज़िंदादिली का नाम है,
मुर्दा दिल क्या ख़ाक जिया करते हैं ,
हयात लायी आये, क़ज़ा ले चली चले,
अपनी ख़ुशी न आये हम, न अपनी ख़ुशी चले,
ज़िन्दगी जिंदादिली का नाम है………
हम हैं खुदा के बन्दे, डरते नहीं किसीसे,
जो काम सामे आया, करते गए खुशी से,
ना कुछ भी साथ लाये थे, न कुछ साथ ले चले ….
हयात लायी आये, क़ज़ा ले चली चले,
अपनी ख़ुशी न आये हम, न अपनी ख़ुशी चले,
ज़िन्दगी ज़िंदादिली का नाम है………
जीने का क्या है मक्सद, क्यूँ सोचना भला,
मर्जी ये सब खुदा की, उनको है सब पता,
इंसानियत निभाई है, जब तक यहाँ रहे,
अल्लाह को ना भुलाया है, जब तक यहाँ जिए,
हयात लायी आये, क़ज़ा ले चली चले,
अपनी ख़ुशी न आये हम, न अपनी ख़ुशी चले,
ज़िन्दगी ज़िंदादिली का नाम है………
दिल था फ़िदा यहाँ पर, जब तक यहाँ रहे,
सुख दुःख और प्यार बांटा, जब तक यहाँ पले.
ना फ़िक्र ये न जानते, अब हम कहाँ चले,
खुश हैं की ये न जानते, अब हम कहाँ चले …..
हयात लायी आये, क़ज़ा ले चली चले,
अपनी ख़ुशी न आये हम, न अपनी ख़ुशी चले,
ज़िन्दगी ज़िंदादिली का नाम है………
मुर्दा दिल क्या ख़ाक जिया करते हैं…..!
“विश्व नंद” -



बहुत खूब सर
Chandan ji
Thanks very much for the compliment..
bohot sunder sir.
Kshipra ji
aapke comment ne khushii bahaal kar dii.
Hardik dhanyvaad..