| « परवाज परिन्दो के गयी बस मे नहीं रह। | मेरे जीवन का हर इक पल …….! (भक्तिगीत) » |
दुख रहे दिल सैकड़ों के हैं तेरे अशआर से।
| Uncategorized |
खुद के पैरों पर खड़े थे जो हुए मीनार से।
जो सहारा ढूँढ़ते थे गिर गए दीवार से ।
ख़्वाब जीतों के यहाँ बस देख के जीता है कौन,
जीत पायी है जिन्होने सीख ली कुछ हार से।
डूब जाना ही न क्यों किश्ती का उस अंजाम हो,
नाखुदा जिसके मुसलसल लड़ रहे पतवार से।
उनको तहजीबे वफ़ा कैसे सिखाएगा कोई,
प्रेमपत्रों को रहे लिख जो भला तलवार से।
बेहिसी तारी ज़हन पे ताकि इसके रह सके,
वो दिखाते हैं तमाशे मुल्क को किस प्यार से।
हो भला अश्खास का,उनके जो हैं ठहरे मरीज़,
चारागर मर्ज़े निहां से जो हैं खुद बीमार से।
होती होंगी कुर्सियां सब गालिबन कश्मीर सी,
बैठते ही बर्फ बनते रहनुमा अंगार से।
इक झलक अपनी दिखा कर वो तो रुखसत हो गए,
सोचते ही रह गए हम क्या मिला दीदार से।
लग रहा है मौत ही आखिर दिलाएगी निजात,
ज़ीस्त तो जाती जुटाती दर्द के अम्बार से।

Siddh ji aapke ashaar se kisi ke dil nahi dukh rahe hai mook bhaavanaao ko bhaashaa mil rahi hai
dhanyavad Rajendrja ji.Mera maan aur man donon rakhne ke liye dhanyavad.
aap sher kahna chhor denge to duniya se ek shayri ka sant kam ho jayega,is field ke ek guru ho aap ,hamara kya hoga sir.
होती होंगी कुर्सियां सब गालिबन कश्मीर सी,
बैठते ही बर्फ बनते रहनुमा अंगार से।
बहुत खूब बहुत खूब
abhibhoot karne vali pratikriya ke liye kshipra aur chandan ji ka aabhaar.