| « बस न होने के बराबर तेरा होना ठहरा। | मुंह ढंक के सुख से सोइये, होना है जो भी हो रहे » |
सब मुसाहिब ठहाके लगाने लगे।
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मुल्क़ जिससे बिल आख़िर ठिकाने लगे।
आप हरबे वही आजमाने लगे।
आ गयी जब घडी सर पे इन्साफ की,
आतताई हमें वो बताने लगे।
बस्तियां खो गयीं उसकी बुनियाद में
वो हवेली जब अपनी उठाने लगे।
चाल निकले वो हैं दामे सय्याद के
जो शुरू में परिंदों को दाने लगे।
उनकी नज़रें जमी जेब पर ही रहीं,
ज़ख्मे दिल हम उन्हें जब दिखाने लगे।
ओहदे की भला पूछ क्योंकर न हो,
फोन अब रातों दिन घन घनाने लगे।
ऐसा नुकसान पहुँचाया यारों ने है,
जिसकी भरपाइयों में ज़माने लगें।
उनके होंठों पे हलकी हंसी क्या दिखी,
सब मुसाहिब ठहाके लगाने लगे।
