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सिखाये मुसलसल सबक ज़िन्दगी ने।
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सिखाये मुसलसल सबक ज़िन्दगी ने।
तवज्जुह मगर कम ज़रा दी हमीं ने।
हुई ठोकरों से मुलाक़ात हरदम,
दरकते रहे मेरे पांवों के सीने।
सुकूं में है ख़ुद ख्वाबगाहों में खोया,
कि जिसने सभी के सुकूं चैन छीने।
पहुँच जब गया बामे मकबूलियत पर,
सलीक़े से उसने ढहा डाले ज़ीने ।
बिल आखिर उन्ही पर मेरे पाँव फिसले,
जो मोती बड़ी हसरतों से थे बीने।
दिखाया कभी आईना वक़्त ने जब,
हुए शर्म से हम पसीने पसीने।
हुए टस से मस ना किनारे ज़रा भी,
लहर दर लहर की गुज़ारिश नदी ने।

Vaah, bahut khuub
kuch sher hain ye jaise nageene
awesome-every couplet is impressive and having deep feeling-badhaaee Singh saahib