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***चीर हरण ……….***

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Hindi Poetry

चीर हरण ……….

 

आखिर क्योँ है 

हृदय में 

इतनी घुटन 

मौन स्वरों का 

शायद है ये 

अन्धकार को अभिनन्दन 

और प्रतीत होता है 

कांपते अधरों पर 

आधे अधूरे समर्पण का 

कुछ धीमा धीमा क्रंदन 

स्मृति में शेष है अब  भी 

सुर्ख  कपोलों पर 

उस एकांत का 

मासूम सा  स्पन्दन 

न,न  

ऐ बूंदों  

अभी मेरे भ्रमर समान 

कुन्तलों से 

मेरी हथेली पर 

गिरने की व्यर्थ में 

चेष्टा न करना 

तुम्हारा जमीन पर 

बिखर जाना 

मेरे अंतर्मन को 

और भी व्यथित कर जाएगा 

प्रतीक्षा का प्रत्येक क्षण 

अश्रुधार में बदल जाएगा 

मेरा उसमे और 

उसका मुझमें 

समाहित 

निश्छल समर्पण 

इक दूसरे की आस्था का 

चीर हरण कर जायेगा 

 

सुशील सरना 

4 Comments

  1. siddhanathsingh says:

    sundar aur bhavbheeni.

  2. sushil sarna says:

    haardik aabhar Singh saahib aapkee is housala afjaaee ka

  3. parminder says:

    सुन्दर रचना , सुन्दर अभिव्यक्ति |

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