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थी ये उम्मीद न वो कुछ भी उठा रक्खेंगे।
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थी ये उम्मीद न वो कुछ भी उठा रक्खेंगे।
दिल में मेरे भी लिए कोई जगह रक्खेंगे।
लाजमी है कि घुटन होगी समूचे घर में,
कोई गर आप दरीचा न खुला रक्खेंगे।
जो क़फ़स है वो बहरहाल क़फ़स ही रहना,
लाख सोने से उसे आप सजा रक्खेंगे।
गर न आवाज़ उठानी है खिलाफे ज़ालिम,
किस लिए आप भला मुंह में ज़बां रक्खेंगे।
कोसते होंगे भले आप को मन ही मन में,
जाहिरा लब पे सभी हर्फ़े दुआ रक्खेंगे।
कोठरी आप ने काजल की बना रक्खी है,
आप सूरज को भला इसमें कहाँ रक्खेंगे।
सूखने देंगे नहीं प्यार के पौधे को हम,
अपनी आँखों में सदा आबे रवां रक्खेंगे।


awesome Gazal with deep feelings-liked it very much-badhaaee SN sahib
shukriya tahe dil se shukriya ji.