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उन्हें ख़याल न था और हमें क़रार न था।
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उन्हें ख़याल न था और हमें क़रार न था।
हुजूमे ग़म थे त-अक़्क़ुब में,गमगुसार न था। त-अक़्क़ुब –पीछा करना
वो कैफ़ियत थी फिज़ा में कि गुल खिले ही नहीं,
ये सच नहीं कि यहाँ मौसमे बहार न था। कैफियत-प्रभाव ,गुल-फूल
है लौट लौट गयी बारहा नज़र दर पे,
मैं इस गुमां में रहा मुझको इन्तिज़ार न था। बारहा-बारम्बार
जुड़े हुए थे ज़हन से ही कुछ मेरे भटकाव,
दयारे यार का रस्ता घुमावदार न था। दयारे यार-प्रियतम का स्थान
जो हो रहा था सभी कर रहे थे अनदेखी,
वो इस गुनाह का वाहिद गुनाहगार न था। वाहिद-एकमात्र
बिकाऊ बन के वहां हुक्मरान बैठे थे,
मैं कैसे मान लूँ सरकार थी, बज़ार न था।
हमाम में थे यहाँ से वहां सभी उर्यां,
वगरना कौन वहां था जो बा- वक़ार न था। उर्याँ-नग्न ,बा-वक़ार -प्रतिष्ठित

bahut khuub
बा- वक़ार hii yahaan jo aaj power me hain, apanaa lobh me latpat उर्यां roop dikhaa rahe hain…..