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उन्हें ख़याल न था और हमें क़रार न था।

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उन्हें ख़याल न था और हमें क़रार न था।

हुजूमे ग़म थे त-अक़्क़ुब में,गमगुसार न था।  त-अक़्क़ुब –पीछा करना

 

वो कैफ़ियत थी फिज़ा में कि  गुल खिले ही नहीं,

ये सच नहीं कि यहाँ मौसमे बहार न था।  कैफियत-प्रभाव ,गुल-फूल

 

है लौट लौट गयी बारहा नज़र दर पे,

मैं इस गुमां में रहा मुझको इन्तिज़ार न था।  बारहा-बारम्बार

 

जुड़े हुए थे ज़हन से ही कुछ मेरे भटकाव,

दयारे यार का रस्ता घुमावदार न था। दयारे यार-प्रियतम का स्थान

 

जो हो रहा था सभी कर रहे थे अनदेखी,

वो इस गुनाह का वाहिद गुनाहगार न था।  वाहिद-एकमात्र

 

बिकाऊ बन के वहां हुक्मरान बैठे थे,

मैं कैसे मान लूँ सरकार थी, बज़ार न था।

 

हमाम में थे यहाँ से वहां सभी उर्यां,

वगरना कौन वहां था जो बा- वक़ार न था। उर्याँ-नग्न ,बा-वक़ार -प्रतिष्ठित   

One Comment

  1. Vishvnand says:

    bahut khuub
    बा- वक़ार hii yahaan jo aaj power me hain, apanaa lobh me latpat उर्यां roop dikhaa rahe hain…..

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