| « बांधी है दिल की नाव ये तेरे दृगों की डोर से। | अन्याय हो अतिचार हो,उसका प्रबल प्रतिकार हो, » |
कई रिन्दों का वो मन रख रहे हैं,
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कई रिन्दों का वो मन रख रहे हैं,
सुराहीदार गर्दन रख रहे हैं।
न घटती दूरिये मंजिल अगरचे,
क़दम तो वो दनादन रख रहे हैं।
ह्रदय चाहे हलाहल से भरे हैं,
ललाटों पे तो चन्दन रख रहे हैं।
ज़रूरी था कि धनुरासन लगाते,
वो निस्पृह हो शवासन रख रहे हैं।
करी भरमार लो आश्वासनों की,
वो खासो आम का मन रख रहे हैं।
दिवस गणतंत्र का कल आ रहा है,
वो इक तैयार भाषण रख रहे हैं।
इधर बेटी गयी बिक मुफलिसी में,
प्रगति का वो प्रदर्शन रख रहे हैं।

दिवस गणतंत्र का कल आ रहा है,
वो इक तैयार भाषण रख रहे हैं।
uprokt panktiyaa pransangik hai
dhanyavad.
Vaah vaah Kyaa baat hai bahut badhiyaa
rachanaa ki jitanii prashansaa karen hogii thodaa
ab to hue vo bhrsht paagal kar kushaasan
dimaag apanaa naa jagah par rakh rahe hain
rachanaa ke liye bahut badhaaii
aabhaar prakat karta hun.