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एक परिंदा ज़मीन का
| Hindi Poetry |
एक परिंदा ज़मीन का….आज करता बादलों से बात हैं….
एक परिंदा ज़मीन का….आज आसमान की शान हैं….
वो रोज़ ज़मीन पर आता हैं….क्यूंकि इस ज़मीन से ही उसकी पहचान हैं..…
वो उड़ता हैं आसमान में….क्यूंकि ज़मीन पर ही रख छोड़ा उसने अपना अभिमान हैं….
एक परिंदा ज़मीन का….करता सबके दिलो पर राज़ हैं….
एक परिंदा ज़मीन का…..बड़ा दयालु…..बड़ा दयावान है…..
कुछ लोग उसके आगे झुकते हैं….
मगर दिल ही दिल में उससे जलते हैं….
कहते हैं कि….वो परिंदा बस किस्मत का धनी हैं….
भूल जाते हैं कि…..उसने उड़ने के लिए कितनी मेहनत की हैं….
कितनी बार गिरा हैं…..
और कितनी बार गिर कर फिर खड़ा हुआ हैं…..
फिर उड़ा हैं….
वो सब तो बस एक बात से परेशान हैं….
जान कर भी……बन रहे अनजान हैं……
एक परिंदा ज़मीन का…..आज कैसे भर रहा उड़ान हैं….
एक परिंदा ज़मीन का…..आज कैसे आसमान की शान हैं….
वो लोग उसकी तारीफ़ करते हैं….
कहते हैं कि….वो सबसे महान हैं….
वो भी उनको अपना समझता हैं….
उनके लिए अपने अपनों से भी लड़ता हैं….
वो अपने जिन्होंने था उसे उड़ना सिखाया….
जिन्होंने था उसे आसमान की शान बनाया….
पर वो परिंदा अब उन्हें अपना बताता नही……
उनसे मिलने अब कभी ज़मीन पर आता नही….
एक परिंदा ज़मीन का….आज कर रहा अभिमान हैं….
एक परिंदा ज़मीन का….आज खुद को समझने लगा महान हैं….
वक्त रहा कब किसका ग़ुलाम हैं…..
बदलना ही तो वक्त का काम हैं….
एक रोज़ एक हवा का झोंका आया….
लाख संभाला….पर वो परिंदा संभल ना पाया….
गिरता – गिरता…वो आ कर ज़मीन से टकराया….
बहुत चीखा……बहुत चिलाया….
ना जाने कितनो को अपनी मदत के लिए बुलाया….
पर जो लोग उसके आगे झुकते थे….
मगर दिल ही दिल में उससे जलते थे….
सारे पीछे हट गए…..कोई उसकी मदत को ना आया….
एक परिंदा ज़मीन का….आज ज़मीन पर पड़ा बेहाल हैं…..
एक परिंदा ज़मीन का….आज खो चूका अपनी शान हैं…..
कब तक कितनो को अपनी मदत के लिए बुलाता…..
कब तक कितनो को अपना दुखड़ा सुनाता…..
खुद ही अपने पैरो पर…चल पड़ा हैं….
अपने पंखो से ज्यादा….उन लोगो के दुख में टुटा पड़ा हैं…..
एक परिंदा ज़मीन का….समझ चूका कौन उससे जलता और कौन उसके साथ हैं…..
एक परिंदा ज़मीन का…देख रहा आज ज़मीन से ही आसमान हैं….
एक दिन वो परिंदा चलते – चलते अपने जंगले में आया….
वहा उसने अपने अपनों को पाया….
वो अपने जिन्होंने था उसे उड़ना सिखाया….
जिन्होंने था उसे आसमान की शान बनाया….
भूल कर सरे गिले शिकवे…..
सब ने उसको दिल से गले लगाया…..
किसी ने हौसला दिया….
किसी ने दो मीठी बात की….
और किसी ने उसके झाक्मो पर मरहम लगाया……
किसी ने उसके लिए नए पंख बनाये….
तो किसी ने फिर से उड़ना सिखाया…..
एक परिंदा ज़मीन का…..आज फिर अपनों के साथ हैं…..
एक परिंदा ज़मीन का….आज फिर बनाना चाहता आसमान की शान हैं….
वो परिंदा समझ चूका एक बात हैं……
चाहे कोई परिंदा जितना भी महान हो…..
लोग कहते उसको आसमान की शान हो….
पर वो हर दम उड़ना सीखता हैं…..
भले ही लेता वो जितनी भी उची उड़ान हो….
अब भी वो उड़ते – उड़ते गिर सकता हैं…..
बात यह नही….कि वो कितनी उचाई से गिरा हैं…..
बात हैं….कि गिर कर फिर खड़ा हुआ हैं…..
आज फिर उड़ रहा हैं…..
एक परिंदा ज़मीन का…..आज फिर करता बाद्लों से बात हैं…..
एक परिंदा ज़मीन का…..आज फिर आसमान की शान हैं….
– Nishant Aaghaaz Tuteja



सुन्दर अर्थपूर्ण भावनाओं और विचारों की सुन्दर उड़ान है
रचना बहुत मन भायी
हार्दिक बधाई
धन्यवाद विशव जी..!!
rahiman bipada bhi bhali jo thode din hoy.
hit anhit ya jagat me jaan pade sab koy.
बिलकुल सही @siddhnathsingh जी…!!
ek gahan falasafe ko badi hi sundarta se parinde ke maadhyama se pesh karne ke liye badhai.
कविता को पसंद करने के लिए धन्यवाद ….!!