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अन्याय हो अतिचार हो,उसका प्रबल प्रतिकार हो,

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Anthology 2013 Entries, Uncategorized

अन्याय हो अतिचार हो,उसका प्रबल प्रतिकार हो,

ऐसा न हो यदि देश में,समझो गया बीमार हो।

 

जिसमे न रहती एकता,संसार है सब देखता,

समृद्धि के पथ से उसे पल में परे है फेंकता।

 

गणतंत्र में गण गौण हो,ज़ुल्मों पे मुखिया मौन हो,

उसका धणी  धोरी भला दुनिया जहाँ में कौन हो।

 

विद्वान गण  वंचित रहें,प्रतिभा जहाँ कुंठित रहे,

वह देश कुछ मत पूछिए साष्टांग भूलुंठित रहे।

 

अपने पराये में लगे, लड़ते परस्पर हों सगे,

दुर्भाग्यहत उस देश को, जग ये सरलता से ठगे।

 

जागो कि जग दे मान्यता, उट्ठो भुवन दे रास्ता,

लें एकजुट संकल्प तो,मंजिल स्वयं  दे दे पता।

 

यह राष्ट्र दमके रत्नवत, ऐसी प्रगति हो अनवरत,

सब लोभ लिप्सा स्वार्थ तज इस हेतु हो दिन रात रत।

 

पहले वतन फिर व्यक्ति है, आओ सुदृढ़ संकल्प लें,

ऐसा अगर हो आचरण,तब देश के सपने फलें।   

4 Comments

  1. har ek do panktiyo me kuchh nayaa hai kahane ke liye

  2. Vishvnand says:

    हर शेर अति सुन्दर शानदार और अर्थ पूर्ण
    क्या कुछ समझ ये आयेंगे लोभी भ्रष्ट बीमारों को ….!

    रचना के लिए हार्दिक अभिनन्दन

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