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खड़े हुए हैं दहकते नदी किनारे हम।
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खड़े हुए हैं दहकते नदी किनारे हम।
किसी को कैसे बताएं शरम के मारे हम।
अभी जो खाक़ में बिखरे दिखाई देते हैं,
तेरी तरह ही किसी आँख के थे तारे हम।
ये ऐसा खेल था जिसमे कि हार जीत न थी,
गया है जीत अगर तू कहाँ हैं हारे हम।
ये और बात है तुमको ही ये गुमान नहीं,
ज़माना कब से है कहता कि हैं तुम्हारे हम।
दुखों की आंच में अब लोच आ गयी वरना,
कभी वो दिन थे, बला के रहे करारे हम।
खबर है गर्म कि वो ज़ल्द गिरने वाली है ,
कि जिस दिवार के अब तक रहे सहारे हम।
हक़ीक़तों की चटानों पे पाश पाश हुए,
बचा के दिल में जो रखते थे ख़्वाब सारे हम। पाश पाश होना-टुकड़े टुकड़े होना
किसी की प्यास बुझाने के अब नहीं क़ाबिल ,
मगर शुरू से तो ऐसे नहीं थे खारे हम।
कुबूल हो न सकी इल्तिज़ा निगाहों की ,
न देखा उसने, किये बारहा इशारे हम। इल्तिजा-अनुरोध

vaah vaah bahut khuub bahut badhiyaa
hai baat vkht vakht kii kisse karen shikvaa
yaad aayen baar baar vo jinke the pyaare ham