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कभी हवा तो कभी रौशनी के काम आये।
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कभी हवा तो कभी रौशनी के काम आये।
चिराग हम थे, किसी न किसी के काम आये।
उम्मीद हमने न दी टूटने मुसाफिर की,
सराब ही थे मगर तिश्नगी के काम आये। सराब-मृगजल-mirage तिश्नगी-प्यास
थे सब्ज़ पेड़ परिन्दों को दी पनाह सदा,
इन्ही के साथ थे पनपे, इन्ही के काम आये।
अगर न ये तो भला ज़िन्दगी का मसरफ़ क्या
जो आदमी ही नहीं आदमी के काम आये। मसरफ-उपयोगिता
लतीफा हमने बना डाली ज़िन्दगी अपनी,
हुजूमे गम में किसी की हंसी के काम आये।
बिछुड़ के तुझसे खयालात जो हुए पैदा,
तमाम उम्र वही शायरी के काम आये।
शुरू में समझी गुनहगार थी जिन्हें दुनिया,
हैं आगे चल के वही रहबरी के काम आये। रहबरी-पथप्रदर्शन
हरे रहे तो बटोही को छाँव दी हमने,
गए जो सूख तो फिर भी ज़मीं के काम आये।

अच्छी रचना …
dhanyavad bhai sahab,magar meri anya rachnaon ke baare me kya khayaal hai?
Antim panktiyaa laajabaab
maja aa gaya…
jb adhure the to kisi ne na dekha hame,
jabki hum har kisi ki kami ke kaam aaaye….
Vaah vaah bahut badhiayaa
Mazaa aa gayaa
pakade gaye to kyaa hame chudaayegii paartii
naahak nahii paise se ham paartii ke kaam aaye…
thanks to all.