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आज़ादी
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आने वाली 26 जनवरी को हम अपना 64 वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहे है।दुनिया के महानतम लोकतंत्र का हम हिस्सा है।लेकिन आज भी हमारे देश में कुछ वर्ग ऐसे है जो अपनी आज़ादी तलाश रहे है हम महिलाओं का वर्ग भी इनमे से एक है …
मेरा वतन आजाद है ,मुझको न आज़ादी मिली
नजरें उठाकर चल सकूं वो राह क्यूं न बन सकी
मेरा ……….
कितनी कलियों को खिज़ा खिलने से पहले खा गयी (कन्या भ्रूण हत्या)
और कुछ ऐसे खिली कि फूल वो न बन सकी (दामिनी इन्ही में से एक थी)
मेरा ………
कह दिया देवी कभी तूने मुझे दासी कहा
तेरी नज़रों में कभी इन्सान मै नi बन सकी
मेरा ……….
कहते हो सरे जहाँ से अच्छा हिंदोस्तान को
हर गली हर मोड़ पर मुझको यहाँ दहशत मिली
मेरा ……
बदलो इस तस्वीर को मेरे वतन के लाडलों
फिर किसी बेटी के आंसू से न भीगे ये जमीं
मेरा …..



an apt clarion call.
Very good composition full of forceful sentiments conerning the rights of women in man’s world.
Woman is considered as ‘dasi’ or ‘devi’ but never as ‘dost’
Kusum
bhut Sundar Racgna