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अभियाचना

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Anthology 2013 Entries, Hindi Poetry

घनघोर जंगलों में
घिरे हुए पैशाचिकता से
लुप्त होती मानवियता से
मुँह छुपाये जी रही हूँ मैं।

छोड़ दो मुझे, आज़ाद करो न
सांसें मैं भी तो लूँ , बंधन खोलो न।
मुक्त कर दो इन बेड़ियों से मुझको
यह आसमान मुझे बहुत है लुभाता।

खुली हवाओं में लहराने को
पंख खोल डोलने को, जी बहुत है करता
इस स्वतंत्र बहती हवाओं को
स्वछन्दता से पीने को, जी बहुत है करता।

जाल फेंको न उन भेड़ियों पर
जो हकदार हैं इन बेड़ियों के
मुझपर ही क्यों अंकुश हर बात पर ?
वह भी तो फ़डफ़डाते रहें सलाखों के पीछे!

घर पर तो सब की माँ, बेटी, बहन, भाभी हूँ
कब बन पाऊँगी मैं देश की बेटी?
क्या अपने हक़ का इज्ज़त-शोहरत-नाम
सहजता से ले पाऊँगी कभी?
क्या आओगे आगे बचाने मेरी अस्मत को
य मूक दर्शक बन देखते रहोगे बर्बरता को?
कब खौलेगा रक्त रगों में तुम्हारी
देख पैशाचिक्ता के घृणित तांडव को?

11 Comments

  1. siddhanathsingh says:

    samsaamayaik rachna ,vicharottejak aur vyagr .

  2. SS Kumar says:

    मुझे शर्म आये में दिल्ली का।
    बातों में हम शेर बड़े हैं, दिल सब का है बिल्ली का,

    मुझे शर्म आये में दिल्ली का।

    भीड़ बड़ी है, लोग बड़े हैं,ढूंडा न इंसान मिलें हैं,
    पल में ही हो जाएँ भेड़िये, मजबूर न छोड़े, ज़ुल्म कड़े हैं,

    ढीली है कानून की डोरी, ढीले सब रखवाले हैं,
    जूँ न रेंगे कान पे इनकी, कुछ न करने वाले हैं,

    इनके लीये यह रोज़ की बातें, मसला सब है खिल्ली का,

    मुझे शर्म आये मैं दिल्ली का।

  3. Vishvnand says:

    सुन्दर प्रभावी दिल को झक झोरती मार्मिक रचना है
    सोच सोच कर हार गए हैं इन दरिंदों को कैसी और क्या सज़ा देना है
    और ऐसे घिनौने कुकर्मों को न होने देने हमें क्या क्या करना है ….
    कैसी घटिया हमारे समाज की अवस्था और क़ानून की व्यवस्था हो गयी है

    बहुत अर्थपूर्ण संवेदनशील रचना के लिए हार्दिक अभिवादन

  4. parminder says:

    @siddhanathsingh: Thank you Siddh ji, isn’t it frustrating to see atrocities everyday? The feeling of rage, helplessness and insecurity automatically arise.

  5. parminder says:

    SS Kumar ji,
    हमें नहीं क्या शर्म इस बात की
    हम भी तो वासी इस देश के
    दिल्ली नहीं, अब तो देश सरोबार
    इन राख्शसी मनोवृत्तियों से |

  6. parminder says:

    आपकी प्रक्रिया का आभार विश्व जी| वास्तव में, हर चीज़ की अत हो गयी है, लगता ही नहीं यह वही देश है जिसके गौरव का बखान हमेशा होता था| बहुत दर्द होता है हर रोज़ जब समाचार घृणित घटनाओं से भरे होते हैं|

  7. SS Kumar says:

    The fact is, we have to correct our basics. It has to start from our homes itself. Parents, particularly mothers have to empower daughters or minimum treat them to be 100% equal to sons. In developed countries, particularly in US & Canada women enjoy great respect & they feel really secured. They do not need any protection because of the family system. They are fully empowered. I am sure a women going even in bikiny in New York city, people may see her because she is dressed differently but nobody would think of assaulting or raping her.

  8. parminder says:

    Absolutely right. But what about the very high and very low categoried spoiled brats??

    • SS Kumar says:

      For them we have to have very very strong hands of law. People also have to wake up & see that nobody with criminal records is sent to Parliament. Presently almost 40% MLA’s/MP’s have criminal records of heinous crimes of murders & rapes, what can we expect from them. I remember my school days in Arya School, Ludhiana where we used to have a full period teaching social values. I feel parents’ equal & intelligent care for both sons & daughters togetherwith teaching of social values at school too, will make the childern responsible.

      मुझे शर्म आये मैं दिल्ली का।
      खुद उलझे, रेप के केसों में, इनसे उम्मीद क्या रख सकते,
      रोज़ इनकी नयी कहानी है, रोज़ इनका नया बहाना है,
      हालात में ऐसे में, अब तो, बस खुद को आगे आना है,
      भरोसा न अब इन सब का है, न ही पुलिस नठिल्ली का,
      मुझे शर्म आये मैं दिल्ली का।

  9. jaspal kaur says:

    bahut badhiya likha aapne. kaash ke aisi ghatnayein kabhi n hon.

  10. sushil sarna says:

    vartmaan pripekshy men srijit naaree hrdy ke udgaaron ko vyakt kartee sashakt rachna-haardik badhaae Parminder jee

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