« »

” कुटिया “

0 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 5
Loading...
Hindi Poetry

अलग कुटिया मुझे इस जहाँ से बनानी है।
दरो-दीवार मुझे उसकी प्यार से सजानी है।।

ना गिला ईंट से कोई ना बैर मुझे कंकर से।
छत मगर उसकी तिनके-फूँस की बनानी है।।

आना-जाना बना रहे मौसम के मेलों का।
छवि मुझको उसकी कुछ ऐसी बनानी है।।

खाने को साग सही रोज़ चने या बथुवे का।
इक क्यारी मुझको उसके साथ ही बनानी है।।

झूठ बोला दर्पण आख़िर कब था ‘साहिल’।
दिखाई सूरत जैसी उसे वैसी दिखानी है।।

2 Comments

  1. SN says:

    badi prakritik kavita .

  2. Vishvnand says:

    वाह , अंदाज़े बयाँ बहुत भाया
    और दिल ने जो जो बनाना मन में ठानी हैं
    बधाई

Leave a Reply


Fatal error: Exception thrown without a stack frame in Unknown on line 0