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और चरखा चलता रहे

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Hindi Poetry

किसी पेड़ की
घायल शाख से जैसे 
झरता है पानी 
वैसे ही झरती हैं आँखें 
इस माँ की 

शून्य में निहारतीं 
उसकी दोनों अपलक पुतलियाँ 
मन की स्क्रीन पर देखा करतीं 
वे सभी धुंधले चित्र 
जोकि 
एक-एक करके बनते रहे 
बेटी होने के बोध से लेकर 
तीन बेटियों की माँ बनने तक 

उसकी ‘मुंह देखनी’ कर
गुणगान करते न थकने वालीं 
अब देखते ही उसे 
बिचकाती हैं अपना मुंह 

और जिन्होंने दिया था 
उसे अपना आशीष 
उसी बेला में 
वे भी अब 
मारने लगी हैं ताने 

दम घुटता है 
बेटे न जनने वाली 
इस माँ का 
मन करता है 
खुली हवा में सांस लेने का 

किन्तु रुक जाते हैं उसके पाँव 
ताकि किसी तरह 
घर-गृहस्थी के तार न टूटें 
और चरखा चलता रहे 

 

 

3 Comments

  1. Prem Kumar Shriwastav says:

    कविता सुन्दर अवं अर्थपूर्ण है…

  2. SN says:

    trasdi ka sajeev chitran.

  3. बहुत-बहुत आभार आपका

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