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ये ज़िन्दगी किसी बहुरुपिया सी लगती है.

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ये ज़िन्दगी किसी बहुरुपिया सी लगती है.

कभी ग़ज़ल, तो कभी मर्सिया सी लगती है.  ग़ज़ल-प्रेमगीत मर्सिया-शोकगीत

 

मैं इस हयात को क्या नाम दूँ ये उलझन है,

ये बावफ़ा तो कभी बेवफ़ा सी लगती है.  हयात-जीवन,बावफ़ा-प्रेमालु

 

ये मंजिलों के फ़क़त ख्वाब ही दिखाती है,

ये दौरे हाल के इक रहनुमा सी लगती है.  दौरे हाल-आज के दौर

 

हक़ीक़तों के तकाजों से है ज़रा बरहम,

मिजाज़ से तो बड़ी इश्किया सी लगती है.  बरहम-अस्तव्यस्त,disturbed

 

हरेक जिक्र तेरे जिक्र पर ही थमता है,

मेरी ग़ज़ल की तुही   क़ाफिया सी लगती है.   काफिया-तुक

2 Comments

  1. dolly dubey says:

    ख़ूबसूरत ……………….

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