| « यूँ भी है ज़िन्दगी ने ज़रा साथ कम दिया. | हादसे भूल जाते हैं » |
ये ज़िन्दगी किसी बहुरुपिया सी लगती है.
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ये ज़िन्दगी किसी बहुरुपिया सी लगती है.
कभी ग़ज़ल, तो कभी मर्सिया सी लगती है. ग़ज़ल-प्रेमगीत मर्सिया-शोकगीत
मैं इस हयात को क्या नाम दूँ ये उलझन है,
ये बावफ़ा तो कभी बेवफ़ा सी लगती है. हयात-जीवन,बावफ़ा-प्रेमालु
ये मंजिलों के फ़क़त ख्वाब ही दिखाती है,
ये दौरे हाल के इक रहनुमा सी लगती है. दौरे हाल-आज के दौर
हक़ीक़तों के तकाजों से है ज़रा बरहम,
मिजाज़ से तो बड़ी इश्किया सी लगती है. बरहम-अस्तव्यस्त,disturbed
हरेक जिक्र तेरे जिक्र पर ही थमता है,
मेरी ग़ज़ल की तुही क़ाफिया सी लगती है. काफिया-तुक

ख़ूबसूरत ……………….
dhanyavad