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जा… तू जीता और मै हारा…

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Hindi Poetry

“जा… तू जीता और मै हारा…”

जीतने की ज़िद मत कर दोस्त,
क्योंकि,
ज़िन्दगी ‘जीतने’ के लिए नहीं,
‘जीने’ के लिए होती है…;

एक दिन मै भी जल जाऊंगा
और तू भी जल जायेगा…
और जलने के बाद तो
हमारी राख भी मिटटी में मिलने के लिए होती है…;

ज़िन्दगी का खेल भी बड़ा अजीब होता है…
इसमें भी कम्बख्त हार और जीत का ज़मेला होता है…;

ज़िन्दगी… कभी धूप होती है तो कभी छाव होती है…
लेकिन जी कर जलने में जो मज़ा है दोस्त,
वह ‘जीत’ कर जलने में कहा…;

जीत के नशे ने तो न जाने कितनो को है मारा…
लौट कर आजा दोस्त,
जा… तू जीता और मै हारा…;

– Amit T. Shah
15th September 2012

2 Comments

  1. Vishvnand says:

    वाह क्या बात है
    सुन्दर रचना, ख़याल और अंदाज़ बहुत मन भाया है
    लगता है हार कर असली जीत का मज़ा आपने आजमाया है
    जीत कर जलने और जी कर जलने का सही फर्क सुन्दरता से उभरा है

    Hearty commends

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