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फना

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Hindi Poetry

आजादी से पहले  हमारे पूर्वजों ने जिस भारत की कल्पना की थी आजादी के इतने सालों बाद भी क्या वह हमें नसीब हुई है? अंडमान की धरती पर सेल्यूलर जेल के आँगन में खड़े पीपल के बूढ़े पेड़ की अंतर्व्यथा इस प्रकार उजागर हुई…..

फना

 मैं  पीपल का एक बूढा पेड़………..
मेरी जन्मभूमि को तुम काला पानी कहते हो,
मेरी धरती पर पाँव रखने से कतराते, डरते हो,
पूछो……………
असंख्य कूदती, फांदती डाल्फिनों से,
या फिर नीली-सफ़ेद-काली सतरंगी मछलियों से,
मेरा नीला काला जल कितना गहरा,
ठंडा और शांत है……..

शायद  सदमे में…….

शंख, मोती, सीपी और श्रवाल,
कछुए, केंचुयें, सांप भी,
गवाह हैं मेरी तरह अतीत की त्रासदी के,
गवाह हूँ मैं लाल वर्दी, सफ़ेद टोपी,
कील टंके जूतों की ठोकरों का,
निर्मम, हाड़-भेदी यातना पूर्ण दृश्यों का,
क्षितिज से टकराती चीखों और डूबती सिसकियों का,
कोल्हू में पिले कैदियों की टूटी कमर
और रिसते घावों का,
तपती लू में लोहे की सलाखों की चोटों का,
भूख से तड़प कर गू खाने की लाचारी का,
आह! मैं ज़िंदा रहा….देखने की आस में,
सुफल इस दुर्गति का….

पर… देखकर यथार्थ का सच,
हो जाना चाहता हूँ फना, मैं,
मेरी जन्मभूमि के अतीत के साथ…….

सुधा गोयल ”नवीन”

8 Comments

  1. Vishvnand says:

    अति सुन्दर रचना
    बहुत भावपूर्ण ह्रदय झकझोरती अभिव्यक्ति
    मेरे जैसे जिनने छुटपन में स्वतन्त्रता संग्राम कुछ देखा है
    और अपने बुजुर्गों से तब उसके बारे में काफी कुछ सुना और गर्व से जाना है
    अपने career में राजनीति में पड़कर नही पर अपने profession से देश की सेवा की है
    उनका तो आज ये भ्रष्ट राजनीति द्वारा देश और जनता का हाल देख कर दिल का पछताना और रोना है …

    • sudha goel says:

      @Vishvnand, धन्यवाद!
      आपने सच कहा …बहुत दिल दुखता है, आज देश भक्ति की भी राजनीति हो रही है.

  2. अच्छी रचना है

  3. Harish Chandra Lohumi says:

    सब कुछ समेटे हुई है आपकी यह रचना.
    बधाई !

  4. Siddha Nath Singh says:

    utkrisht shaili aur sashkt kathya.

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