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माँ की ममता

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Hindi Poetry

माँ की ममता के आगे सबकुछ फिंके ,

उनके समक्ष कोई रंग न टिके।

जब हम सब प्रथम बार दुनिया देखे,

माँ , माँ कहकर ही चीखें।

उनके आगे कोई रंग न टिके।

 

सबसे पहले हम माँ की ही ऊँगली पकड़कर चलना सीखे,

तब जाकर अपने पैरों पे खरा होना सीखे।

उनके आगे कोई रंग न टिके।

 

सुख की छाया हो या दुःख के बादल मंडराए,

माँ हरदम साथ निभाए।

हसना रोना भी वो ही सिखलाये,

उनके आगे कोई रंग टिक न पाए।

 

सारी दुनिया माँ की कृपा से ही हमने देखे,

फिर भी कुछ इंसान उन्हें आदर से न देखे ,

वो इनके सन्दर्भ में न जाने क्या क्या सोचे,

पर माँ की ममता के आगे कोई रंग न टिके।

 

जो ही आदर करना सिखलाएँ,

उनका ही आदर हम कर न पाए।

सोचो जरा सोचो तब हम क्या पाएँ,

उनके आगे कोई रंग चढ़ न पाए।

माँ की ममता के आगे कुछ टिक न पाए,

कुछ रुक न पाएँ।

 

धीरज कुमार

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