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हर रोज चलता हूँ मैं, हर रोज जलता हूँ मैं…

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Hindi Poetry

हर रोज चलता हूँ मैं, हर रोज जलता हूँ मैं…

एक ख्वाब लिए आँखों में
एक आग लिए सीने में
हर रोज चलता हूँ मैं, हर रोज जलता हूँ मैं

एक आस लिए दिल में,
एक प्यास लिए होठों पर
एक बात लिए ज़बाँ पर
एक फ़रियाद लिए ज़हन में
अल्हड, अलबेली,अलसाई, अकेली रातों में
हर रोज पिंघलता हूँ मैं….
हर रोज चलता हूँ मैं, हर रोज जलता हूँ मैं

कुछ अनकहे, अनसुने अलफ़ाज़ लिए
कुछ अनसमझे जज्बात लिए
कुछ अनसुलझे हालात लिए
हर रोज घर से निकलता हूँ मैं
हर रोज चलता हूँ मैं, हर रोज जलता हूँ मैं

हर रोज चलता हूँ मैं, हर रोज जलता हूँ मैं…

दिनेश गुप्ता ‘दिन’ [ [https://www.facebook.com/dineshguptadin ]

4 Comments

  1. Dhiraj Kumar says:

    क्या बात है बहुत खूब कहा आपने ..

  2. Vishvnand says:

    सुन्दर रचना और अभिव्यक्ति
    बधाई

  3. Dr. Manoj Bharat says:

    अति सुंदर
    बधाई स्वीकारें

  4. parminder says:

    बहुत सुन्दर!

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