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वाह !! रे रिश्तेदार !! (भाग-2)

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Hindi Poetry

वाह !! रे  रिश्तेदार !!

 

 इन्हें गिरगिट  की तरह रंग बदलना आता है,

वक़्त पड़ने पर इन्हें दुम हिलाना  भी आता है,

डूबते  को और डुबाने,

रिश्तेदार ही तो आता है |

 

जब तक न था, तेरे पास पैसे,

सारे रिश्तेदार, मर गए थे जैसे | 

जैसे ही पैसो की बरसात है होती,

रिश्तेदार मेढक की तादाद है बढती,

अपनापन की टर्र टर्र की आवाज  निकलती,  

फिर एहसानों की लिस्ट दिखाती |

 

ये है रिश्तेदारों की रिश्तेदारी, 

हमें लगती है बड़ी फनकारी |

वाह !! रे रिश्तेदार !! वाह !! रे रिश्तेदार !!

तेरा तो जवाब नहीं |

One Comment

  1. Siddha Nath Singh says:

    bahut sahi kaha.

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