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कलम के सपने

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Hindi Poetry

ये कलम लाकर देना,

 वो कलम लाकर के देना,

 हरी लाकर के देना

और काली भी लाकर के देना।

ये सब कहता एक नन्हा बच्चा प्यारा बच्चा,

अपने बुढ्ढे दादा जी से।

 

दादा जी कहते बच्चे लिखावट हो अच्छे,

कलम के रंग काले हो या हरे,

या हो और रंगों से परे।

 

पर बच्चे ने ठानी जिद्द।

दादा जी  की चल न पाई एक भी चाल,

होकर निढाल वो गए बाज़ार।

दुकान देखे वे हज़ार फिर भी मिल न पाई उन्हें कलम हरी,

क्योंकि वे खोज रहे थे खोल हरी और चाल हरी।

 

जब मिलती चाल हरी तो न रहती खोल हरी,

और जब मिलती खोल हरी तो न मिलती चाल हरी।

 

आख़िरकार दादा जी लौट पड़े घर को,

दादा जी दादा जी की पुकार सुनकर नींद खुले उनके।

वो बहुत खुश हुए, चलो देख रहे थे सपने।

चलो देख रहे थे सपने।

 

धीरज कुमार

3 Comments

  1. Dr. Manoj Bharat says:

    बहुत सुंदर अतीत का व्याख्यान,
    सुंदर प्रतीकों का प्रयोग.
    बधाई.

  2. parminder says:

    बहुत प्यारी कविता! और बच्चे दादा जी को ही तो परेशान करेंगे न?

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