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अपने आप से ही अजनबी क्यूँ ?

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Hindi Poetry

मैं अपने आप से ही अजनबी क्यूँ हूँ,

पास होकर भी तुमसे दूर क्यूँ हूँ ?

जबसे नजरे मिली है तुमसे,

मेरी साँसे क्यूँ दूर हो गई है मुझसे।

क्यूँ मजबूर हो रहा हूँ मैं मिलने को तुमसे,

आखिर क्यूँ मुझे अलग दिखती हो तुम सबसे।

मुझे अपने बिसवास पे विश्वास क्यूँ है,

तुमसे मिलने की अभी भी आस क्यूँ है।

  है लाखो सवाल दिल में,

 सोचता हु मिलने पे पूछूँगा तुमसे-

मैं अपने आप से ही अजनबी क्यूँ हूँ,

पास होकर भी तुमसे दूर क्यूँ हूँ ?

 

जब पहली बार ज़ेरोक्स सेंटर पे

मिली थी तुम मुझसे,

कहा सोचा था की मैं खो जाऊंगा तुममे,

मिल के भी बिछर जाऊंगा तुमसे।

कौन जनता था की तुम निकलोगी किसी गैर की,

तीन सालो तक रहोगी होकर तुम किसी और की।

इन तीन सालो में न जाने

मैं अपने आप से कितना दूर हो गया हूँ,

तेरी एक झलक पाने को कितना मजबूर हो गया हूँ।

सोचता हु मिलने पे पूछूँगा तुमसे-

मैं अपने आप से ही अजनबी क्यूँ हूँ,

पास होकर भी तुमसे दूर क्यूँ हूँ ?

 

मुझे रात दिन क्यूँ पायल की झंकार सुनाई  देती है,

 नींद में भी क्यूँ उसकी आहट सुनायी देती है|

वो होती तो है बहुत दूर ,

फिर भी क्यूँ पास दिखाई देती है|

वो जब ना तड़पती है मेरे प्यार में,

तो मै क्यू तड़पता हु उसके इंतज़ार में|

यदि उन्हें  प्यार है किसी और से ..

(मेरे) बिस्वास को विश्वास  है  किसी और में,

तो मै क्यू बेक़रार हु उसकी याद में

उसके प्यार में….

है लाखो सवाल दिल में,

सोचता हु मिलने पे पूछूँगा तुमसे-

मैं अपने आप से ही अजनबी क्यूँ हूँ,

पास होकर भी तुमसे दूर क्यूँ हूँ ?

 

दिन के उजालो से भी क्यूँ मुझे अब डर लगता है,

चार सालो के बाद  क्यूँ तेरी एक झलक को तरस जाने का डर लगता है।

एक अजीब सी बेचैनी है दिल में,

अभी भी आस लगाये बैठा हूँ तुझसे मिलने की।

आखिर क्यूँ पास आकर

फिर से मुझे दूर कर दिया,

सोचता हु मिलने पे पूछूँगा तुमसे-

मैं अपने आप से ही अजनबी क्यूँ हूँ,

पास होकर भी तुमसे दूर क्यूँ हूँ ?

धीरज कुमार

3 Comments

  1. Vishvnand says:

    ये रचना अच्छी पर जरूरत से ज्यादा लम्बी और इसमें शब्दों की इतनी गल्तियाँ क्यूँ हैं
    लगता है इसमें अभी काफी refinement और सुधार की बहुत जरूरत है ….

    • Dhiraj Kumar says:

      @Vishvnand, विश्वानन्द भाई अगर आपके पास थोडा समय हो तो गलतिया सुधारने का कृपया कीजिये , मुझे हिंदी में लिखे हुए बहुत साल हो गए |
      email id- coderdecoder@gmail.com

  2. parminder says:

    ख़याल अच्छा है शुरुआत भी अच्छी है पर बहुत खिंच जाने के कारण ध्यान बँट जाता है|

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