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—–/// टूट गया अन्नाजी का अनशन ///—–

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Hindi Poetry

टूट गया अन्नाजी का अनशन /
टूट गया मै भी व्यथित हुआ मन /

रिश्वतखोरी ,भर्ष्टाचार से जनता थी घबराई /
उम्मीद की किरण तुमने थी जगाई /
बुझे हुए मन में आग तुमने थी लगाई /
क्यों कर दी पराई,तुमने छेड़ी जो लड़ाई /

जो होंगे तुम हताश तो ,हारेंगे सारे जन /
टूट गया अन्नाजी का अनशन /

लड़ना ना जाने वो भी तेरे साथ हो गये /
तुने उठाया तो खड़े हाथ हो गये /
जन आन्दोलन की वो सभी बारात हो गये /
कैसी बात कह गये , सब अनाथ हो गये /

जैसे चले गये प्राण ,छोड़ कर तन /
टूट गया अन्नाजी का अनशन /

खिची थी जो लकीर बड़ी क्यों वो मिटा दी /
तुमने भी जीवनभर की वो कमाई लुटा दी /
ख़त्म कर आन्दोलन क्यों पीठ दिखा दी /
त्याग में बिता दी उम्र , क्यों ना बता दी /

दूध की तरह धवल तेरा है जीवन /
टूट गया अन्नाजी का अनशन /

8 Comments

  1. Ashant says:

    Nice poem but I hate the sentiment behind it. You were looking for a martyr.
    Life for you is too cheap. 750000 people lost their lives for to get freedom. No more balidaans for the corrupt Indians. That’s what they want (the agitators to die). I respect your thoughts from an Indian point of view where
    No value for life. 20,000 people die Daily of hunger and malnutrition. Nobody cares.

  2. siddha nath singh says:

    शठे शाठ्यम समाचरेत भगवद्वचन है ये सो राज्ज्नीति के तलब की गन्दगी बिना तालाब में उतरे साफ़ कर पाने का सपना यूँ भी अव्यवहारिक ही था, ये जल मात्र ब्लीचिंग पावडर डालने से स्वच्छ नहीं होने वाला था, अब देखना है जनता वास्तव में भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहती है या उसे आन्दोलन देखने में मज़ा आ रहा भर था.

  3. Vishvnand says:

    सुन्दर रचना और अभिव्यक्ति
    पर ये नही है खरी पर जल्द बाजी में हुई असंतुष्टि
    बहुत विचार है इसके पीछे जो आन्दोलन का बदला है ज्ञानियों के सुझाव से अन्ना ने रास्ता
    अगर जनता चाहती है आज के इस देश के भ्रष्ट माहौल से असली मुक्ति
    अन्ना, बाबा रामदेव और सुब्रमन्यम स्वामी जी के support में लगाना है अपनी सारी शक्ति
    यह युक्ति इस विशाल आन्दोलन का ही इक जरूरी पर्याय समझ करना है देशभक्ति

  4. rajendra sharma "vivek" says:

    अब यह देखना शेष है राजनीति के साथ आने वाली बुराइयों से कैसे बच पाता है आन्दोलन

  5. kailash jangid says:

    corruption- its genesis- ever expansive ego(self)-the genetic nature of an individual-unrestrained/untrammeled; somehow in perpetual conflict with the larger and amicable interest of societal existance demanding equitable distribution of natural resources.

    got it….?

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