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मैं उसे हुक्म भी करने लगा इल्तेजा की तरह……………….

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Hindi Poetry

बेबसी नज़र आने लगी रुख पर माहताब के           (माहताब – चाँद)
जाने क्या माइने होंगे आखिर इस ख़्वाब के

दर्द की दीं दुआएँ, दर्द की दवा भी दे दीं
नाम बदल दिए है शायद साक़ी ने शराब के

ज़ख्म मिट जायंगे, दाग़ दोहराएँगे कहानियाँ
मरासिम कुछ ऐसे हुए हैं मेरे और जनाब के           (मरासिम – रिश्ते)

झुलसे हाथ छुपाये फिरता है एक फकीर देखो
चला था ज़ुल्फ़ सुलझाने पागल अफताब  के         (अफताब – सूरज)

मैं उसे हुक्म भी करने लगा इल्तेजा की तरह        (इल्तेजा – REQUEST)
शायद आने को हैं मुझपर दिन अब आज़ाब के       ( आज़ाब – बुरा वक़्त)

मैं कैसे बिछड़ उसको भूल पाउँगा शकील
हर्फ़ हर्फ़ नाम उसका पढ़ते हैं सफ्हे मेरी किताब के  (सफ्हे – पन्ने)

3 Comments

  1. Vishvnand says:

    वाह वाह क्या बात है
    हर शेर शानदार sip करने शराब से
    बहुत बधाई

    साकी ने आने में की यूं तो बहुत देर
    फिर भी आई तो लेकर जाम जवाब से

    उन्हें भुलाऊँ भी कैसे पल पल याद आते हैं जो
    जिन्दगी में मेरे किये हर गुनाहों के हिसाब से ….

  2. Siddha Nath Singh says:

    zulf aaftaab ke ki bajaay zulf aaftaab kee kahna sahi hota. aazaab nahin azaab hota hai shaqeel bhai.

  3. pooja says:

    @ Siddha Nath Singh …
    jaane bhi deejiye Nath jee…
    chotisi galatiya to hote rehti hai…
    dhyaan to idhar deejiye…
    jaha shakeel jee ki gazale bahut badi batein kehti hai…

    @ shakeel jee…
    waah bhi aur aah bhi…

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