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माँ

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Hindi Poetry

माँ

तुम देतीं देतीं और बस देती ही रहीं
ममता दी, प्यार दिया, संरक्षण और अधिकार भी,
पीड़ा सहकर मुस्कुराने की कला,
लांछनों, आक्रोशों को पी जाने की अदा,
माँ कहाँ से लाई इतना बड़ा दिल
कि हमारी माफ़ न कर सकने वाली
भूलों पर भी, कभी न दी सजा.

चोट हमें लगती थी, भर आते नैन तुम्हारे,
खाते जब तक न हम खाना,
एक कौर भी न जाता पेट में तुम्हारे,
आम की बौरों संग आता परीक्षा का मौसम
सो जाते सब तुम जागती संग हमारे,
न कुछ चाहा, न कभी कुछ माँगा,
माँ, क्यों करती थी यह सब,
आज समझ में आया हमारे,
क्योंकि आज किसी ने पुकारा है,
कहकर, माँ……माँ………..

सुधा गोयल ‘नवीन’

6 Comments

  1. Siddha Nath Singh says:

    marmik

  2. Vishvnand says:

    बहुत भावभीनी माँ पर अति सुन्दर रचना
    और अनुभूति की खूबसूरत अभिव्यक्ति
    बहुत मनभावन
    हार्दिक अभिवादन

  3. parminder says:

    अत्यंत खूबसूरत!

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