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सब कुछ जैसे ठहरा है आजकल

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Hindi Poetry
 सब कुछ जैसे ठहरा है आजकल
सूरज जैसे जलकर भी नहीं जलता
चाँद जैसे चलकर भी नहीं चलता
घड़ियाँ दिन-रात से परे है
वक़्त इन सबसे  हटकर देता पहरा है आजकल
 सब कुछ जैसे ठहरा है आजकल |
 
चाहकर भी किसी को सुन नहीं पाती
गीत कोई पुराना गुन नहीं पाती
सरगम हो गयी है बेआवाज
मन इन सबसे  बहरा है आजकल
 सब कुछ जैसे ठहरा है आजकल |
 
 आंसूं आँखों का रास्ता गए भूल
कुछ सही भी लगता है ऊल-जलूल
फब्तियां अधर खिला जाती है
दर्द इन सबसे  गहरा है आजकल
सब कुछ जैसे ठहरा है आजकल |
 
झाँका जब भी खुद में,हर बार मैं ही नजर आई
जाने क्यों दुसरे चाहते है कोई और परछाई
सपने को गहरी नींद सोना आ गया
आइना इन सबसे छुपता चेहरा है आजकल
सब कुछ जैसे ठहरा है आजकल ||

6 Comments

  1. Siddha Nath Singh says:

    achhi kavita.

  2. Vishvnand says:

    सुन्दर रचना, बहुत मन भायी,
    इक mood की विशेष सुरुचिपूर्ण (elegant) अभिव्यक्ति
    हार्दिक बधाई …

  3. jaspal kaur says:

    अच्छी कविता.

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