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ये नफरतों के मसीहा हैं, कब निहाल करें.

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ये नफरतों के मसीहा हैं, कब निहाल करें.
हरेक गुंचा मुहब्बत  का पाएमाल करें. गुंचा-फूल पाएमाल -पद दलित.
 
करो सुलूक़ कि जैसी हो आप की मर्ज़ी,
वक़अत ही क्या है हमारी कि हम सवाल करें.
 
ये गम तो एक समंदर है,हद कहाँ इसकी,
अब इसके गम में न जीना तो हम मुहाल करें.
 
जहाँ पे हार गए आफताबरू सारे,
है जुगनुओं से अरज रोशनी बहाल करें.
 
ज़माना कौन सा आशिक़ था बस तुम्ही तो थे,
भुला जो तुमने दिया सबसे क्या मलाल करें.
 
अगर मुराद है साए की,फूल की,फल की,
ज़रा दरख़्त की लाजिम है देख भाल करें.
 
जवाब देने की ज़हमत तलक नहीं करते  ,
सितमज़रीफ़ उन्हें लाख मिस्ड काल करें.
 
अदब के साथ भी हो अर्जे मुद्दआ तो क्या,
ये कब हुआ कि न वो आँख लाल लाल करें. 

2 Comments

  1. jaspal kaur says:

    Nice gazal depicting truth.

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