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आदमी के भेस में ये कौन आदमखोर हैं………………………

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Anthology 2013 Entries

Facebook पर गुवाहाटी की उन तस्वीरों को देखकर आज फिर मन आक्रोश से भर आया और कलम बस चलती गयी……………

आदमी के भेस में ये कौन आदमखोर हैं………………………..

 

कहाँ गुम है वो ठंडी पुरवाई, ये कैसी बेशर्म हवाओं का जोर है
आदमी के भेस में ये कौन आदमखोर हैं………………………

बाहर इतना सन्नाटा क्यूँ है, जब अन्दर इतना शोर है
ये लहू इंसानों का है या इसका रंग कुछ और है………

कोलाहल में दबी चीखे क्यूँ नहीं सुनता कोई तमाशबीन
इंसानों में हेवानों सी ये कैसी अजब सी होर है…………

कब तक सोचता रहे ये मतलबी जहाँ, ये कोई अपना नहीं ये तो कोई और है
कल तुम्हारा भी हो कोई सकता है वहाँ, जहाँ आज कोई गैर है…………..

कहाँ गुम है वो ठंडी पुरवाई, ये कैसी बेशर्म हवाओं का जोर है
आदमी के भेस में ये कौन आदमखोर हैं………………………..

दिनेश गुप्ता ‘दिन’ [https://www.facebook.com/dineshguptadin]

One Comment

  1. U.M.Sahai says:

    आज-कल की घटनाओं को दर्शाती एक सुंदर रचना.

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